आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Ek naya zahaan

मेरे अल्फाज़

एक नया जहां

Bhavna Kalyani

4 कविताएं

16 Views
जख्म अपना अब औरों को न दिखाया जाए
क्यों न अपना एक अलग जहां बसाया जाए

कुछ कदम तुम चल लो और कुछ कदम हम
फासला- ए -दरमियाँ बराबर से मिटाया जाए

नासाज़ सी हो चली , तबियत अकेले पन से
अब यूँ कर लें, एक दूजे को ही सताया जाए

अब नहीं लगा करते मेले इस शहर में शायद
आपस में मिल जलसा-ए-इश्क़ मनाया जाए

मुस्कुराहट तो, लबों से छूट के गुमशुदा सी है
हँसी को भूलकर आज खुद को रुलाया जाए

उजड़े हुए जो दर-ओ-इमारत तो गम न कीजै
उम्मीद-ए-आशियाँ चल फिर से सजाया जाए

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!