रूदाली

                
                                                             
                            जिदंगी की दौड़ मे
                                                                     
                            
बदल ग़यी ये दुनिया
पर नही बदला ये समाज
नही बदली हमारी व्यथा
रूदाड़ी है हम
किसी पर हँसना नही जानते
पर अपनी व्यथा छिपाकर
ओरो की व्यथा को महसूस
कर अश्रु बहाते है
रूदाड़ी है हम कोई तस्कर नही
फिर भी किसी गली से गुजरें तो
लोग हमें हेयदृष्टि से देखकर
नजर चुराते है लक्ष रूपये
कमाकर भी तुम अपना गम
नही सह सकते हम चंद पैसे
कमाकर हर किसी की मृत्यू
के गम का बोझ उठाते है
रोना सिखाया हमे हमारी
वृत्ति ने पर किसी पर हँसना नही सिखाया

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3 years ago

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