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मेरे अल्फाज़

कुदरत और इंसान

Bhakti Samarparn

11 कविताएं

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ॐ नमः शिवाय ।

अनजान नहीं थे वो मुझसे, न मैं उनसे अनजान रही,
कितना देखा कितना जाना,जैसे जन्मों से पहचान रही।

बात बहारों की चलती हम मिल कर फूल खिलाते है,
न वो मेरा अरमान रहे, न मैं उनका अरमान रही ।

कहने को तो कह लेते है हम आपस मे सारी बातें,
न मेरी कोई बोली है, न उनकी कोई जुबान रही।

गोते खायें है हमने भी उनके इश्क की लहरों में,
न मेरे हाथ में डोरी थी, न उनके हाथ कमान रही ।

समझ ही लेते है हम एक दूजे के जज्बातों को,
न दूर रहे मुझसे वो, न उनकी मैं मेहमान रही।

देते ही रहते है हर पल सामान मुझे वो जीने के,
वो मेरा ही तो जिस्म बने मुझ में उनकी ही जान रही।

आबाद रहेगी ये दुनिया 'रीना' जब तक,
कुछ और नही वो कुदरत और मैं इंसान रही।

रीना 'भक्ति'


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