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Difference between society of old and modern

मेरे अल्फाज़

प्राचीन अौर नवीन समाज में अंतर

Bhaiya Reetesh

1 कविता

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न मैदान रहा वो अौर समय भी वो नहीं,
न साथियों का संग अौर मौसम भी वो नहीं।
न जीने का कोई ढंग अौर  रंग भी वो नहीं,
न है कोई साथ;अौर अगर हैं  तो संग भी वो नहीं॥

न प्रेम रहा वो;सद्भाव भी वो नहीं,
न चाह रही वो अौर चाहत भी वो नहीं।
न ख्वाहिश रही  वो अौर सपने भी वो नहीं,
न मंजिल रही वो अौर राही भी वो नहीं ॥

न लोग (वृद्ध) रहे वो अौर बातें भी वो नहीं,
न चबूतरे हैं वो अौर चौपालें भी वो नहीं।
न मामले रहे वो अौर न्याय भी वो नहीं,
अदालतें तो हैं  पर मुखिया वो नहीं॥

न बीज रहे वो अौर फसल भी वो नहीं,
न खाद पानी वो अौर income भी वो नहीं।
पैसा लगा रहा कृषक लेकिन फसल के दाम ही नहीं,
क्योंकि बिचौलिये हैं  जो ;लेकिन साहूकार भी वो नहीं॥

न भूख रही वो क्योंकि मेहनत भी वो नहीं,
है पैसों की भूख लेकिन; भोजन से मिटने वाली ये नहीं।
न नींद रही वो अौर रातें भी वो नहीं,
न चैन रहा वो अौर शुकुन भी वो नहीं॥

गीत तो हैं  वो ;पर वाद्ययंत्र वो नहीं,
नृत्य तो हैं  वो;पर नाचने वाले वो नहीं।
न हैं  प्राचीन शुभ संकेत अौर मानने वाले भी वो नहीं,
क्या बदला है समय? या बदल गयी ये जमीं?

न तंत्र -मंत्र वो अौर साधु बाबा भी वो नहीं,
अब भरोसा नहीं रहा क्योंकि इतने अच्छे भी ये नहीं।
न शासन रहा वो अौर कर्मचारी भी वो नहीं,
न साधन रहे वो अौर साधना भी वो नहीं॥

बन गयीं गगनचुंबी इमारतें; झुग्गी झोपड़ियां रही नहीं,
मिट गयी पगडंडी; पक्की सड़कें हैं बनीं;
सड़कों से क्या ?; दुर्घटनाएँ बड़ गयीं,
सभी सुख साधन तो हैं ;पर सुख है नहीं॥

हैं सभी व्यस्त ; फ्री भी कोई नहीं,
आजाद हैं सिर्फ़ पंछी; मनुष्य कोई नहीं।
धन कमाने की होड अौर अब धनी भी वो नहीं,
दुख हैं अगर तो सुखी भी कोई नहीं॥

न पढाई रही वो अौर पढने वाले भी वो नहीं,
खुल गए स्कूल; गुरूकुल अब वो नहीं।
सब छपता था दिमाग मे; कलम थी जो नहीं,
पालन होता था गुरू की आज्ञा का लेकिन अब शिष्य  वो नहीं॥

बड रही है जन्मदर; पर भाईचारा वो नहीं,
उम्र भी कम हो गयी; लोग जीते भी अब नहीं।
भाई भाई लड रहा; दुनिया लालची बनी,
मान तो दे रहा; पर सम्मान वो नहीं॥

आधुनिकता की अंधी दौड; संस्कृति लुप्त हो रही,
कोई आईना दिखा दे इनको; या चलता रहेगा बस यूँ हीं।
वक्त है  अभी साथियों ; जाग जाअो तुम अभी,
वरना वक्त ऐसा आएगा कि विलुप्त हो जाएगा सभी॥

चमचमाती बिजली लेकिन रोशनी वो नहीं,
वो मशालों की रोशनी; चकाचौंध थी नही।
भड़भडाती मोटरें पानी निकल रहा नहीं,
पानी निकल रहा नहीं या पानी बचा ही नहीं॥

माँ बाप को भूल रहा मनुष्य; पत्नी प्रिय है बनी,
जोरु का प्रेम याद हैं ; माँ की यादें गुम हुईं।
जब सोचा इन पलों के बारे मे; तो आँखें नम हुईं,
काँप रहें हाँथ; कलम चल रही नहीं॥

क्यों रूक गई कलम कुछ समझ आ रहा नहीं,
लिखूँ अब मैं क्या या लिखूँ भी कुछ नहीं;
लिखूँ अब मैं क्या या लिखूँ भी कुछ नहीं॥

कौटिल्य

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