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मेरे अल्फाज़

होते ही भोर.

Bhadrapal Tyagi

50 कविताएं

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होते ही भोर
सड़क के किनारे
श्वानों का शोर
और कंगाल बच्चे
दोनों ढूंढते
कोई ठौर ठिकाना
बिखरा दाना
भटकते रहते
सुबह शाम
इधर से उधर
नंगे अनाम
बीन रहे कबाड़
गर्मी ठण्डी में
जीना है मरना है
पगडण्डी में
देख उनको लोग
आँखें चुराते
संवेदना से हीन
निकल जाते
और कुछ घूरते
बने आदमखोर.
भद्रपाल त्यागी 


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