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मेरे अल्फाज़

तब और अब

Bakshi Mamta

3 कविताएं

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वह भी एक गहरा साया था,
जो करीब 200 वर्ष तक भारत पर छाया था
गुलामी सहने वाले तो बहुत थे,
कुछ के मन ख्याल-ए-इंकलाब आया था

कई माताओं ने अपने बच्चे,
बच्चों ने पिता और स्त्रियों ने सुहाग गवाया था
तब धरती माँ से जुड़ा नाता समझ में आया था.

जब स्वतंत्रता के लिए नारा गांधी, भगत, बोस, तिलक जी ने लगाया था,
तब हर भारतीय अपना खून बहाने बेझिझक सामने आया था
भारतीयों के बलिदानों से फिर सुनहरा भारत सामने आया था
जान निछावर कर जिन्होंने,
अपना अस्तित्व बचाया था 

आज फिर वही काला साया देश पर छा रहा ह
जब भाई ही भाई का खून बहा रहा है 

क्या इसी दिन के लिए उन्होंने अपनी जान की आहुति दी थी ,
देख पाते तो सोचते कि हमने सही राह चुनी थी ?

जब मानव से मानवता दूर होते देखते होंगे, यकिनन अपनी बलिदानी पर दुखी होते होंगे

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