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मेरे अल्फाज़

गीता छंद विधान होली

Babu Lal

132 कविताएं

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. *गीता छंद विधान*
. २६ मात्रा
२२१२ २२१२ २२१२ २२१
१४,१२ पर यति, दो पद समतुकांत
. --------------------
. *होली*
. ---------------
होली मचे फागुन रमें, फसलें रहे आबाद।
पंछी पिया कलरव करे, उड़ते फिरे आजाद।

मैं तो हुई बेचैन हूँ, मिलने तुम्हे पिव आज।
आओ प्रिये फागुन चला,अबतो सँवारो काज

फसलें पकी हैं झूमती,मिलके करें खलिहान।
सखियाँ सभी है खेलती, बिगड़े हमारी शान।

आजा विदेशी पाहुने, खेलें स्वदेशी रंग।
साजन हमारे साथ हों, फरके पिया मम अंग।

कोयल सनेही बोलती,लागे अगन सुन गीत।
ये रंग भँवरे फूल पर, वह राग भी सुन मीत।

फागुन सनेही मीत है, तू मान मेरी बात।
कैसे बताऊँ भोर की, जो बीतती है रात।

कब तक निहारूँ बाट मैंं, साजन बने बे पीर।
नदिया बनीे आँखे बहे, अब पीव हम दो तीर।

मिलना लिखे हो भाग्य में,होली निहारूँ बाट।
कैसे मिलूँ मै जीवती, पकड़ी मनो हूँ खाट।
. 👀👀
✍©
बाबू लाल शर्मा "बौहरा"
सिकंदरा,दौसा,राजस्थान
👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀

गीता छंदाभ्यास हेतु आदर्श रचना




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