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मेरे अल्फाज़

भगवान

AYUSH RANA

2 कविताएं

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अपने भगवान को समर्पित चंद अधूरी पंक्तियां।

ना देखा अल्लाह मैंने,
ना देखा भगवान,
बहुत गया मै मंदिर-मस्जिद,
मिला तो बस इंसान,

थक हार के लौटा घर को,
बहुत था मै परेशान,
माँ ने लगा दी रोटी आगे,
पिता ने किया सम्मान,

बेशरमी से निवाले
अंदर जा रहे थे,
सुस्ताने के लम्हे
करीब आ रहे थे,

बिस्तर पर लेटे हुए,
एक ख़याल आया,
माँ भी तो भुकी होगी,
क्या उसने खाना खाया ?

घर की पूर्ती करने को,
बाप पर काम का कर्ज़ रहता है,
उम्र की देहलीज़ में सिमटा वो भी,
अब रात को पैरो में दर्द रहता है,

ये सब कैसे भूल गया मैं,
क्या यही है मेरा ईमान ?
दुनिया भर में ढूंड लिया,
और घर में मिला भगवान।

मैं गिरता था माँ थाम लेती थी,
मुसीबत में भी साहस से काम लेती थी,
खरोंचे मुझे लगती थी,
पर दर्द में माँ होती थी,
मुझे तो सुला देती थी,
पर रात को खुद रोती थी।

वो अपना दुःख बखूबी
छुपाना जानती थी,
वो लाख परेशानियां दबा कर
मुस्कुराना थी।

मेने उसे कभी थका हुआ नहीं देखा,
जब भी देखा, डटा हुआ देखा,
वो ज़िम्मेदारियों का बखूबी सेहत था,
वो कितना भी थका हो पर किसी से न
कहता था।

परिवार की अछी परवरिश में
ज़िन्दगी काट दी उसने,
पत्नी और बच्चों की खुशियों के बीच,
तनख्वा बांट दी उसने।

अरे उनको कैसे भूल जाऊ मै,
जिनसे जग में मिली पेहचान,
दुनिया भर में ढूंढ लिया,
और घर में है मेरा "भगवान "।


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