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PRAKRITI KA SHOAR

मेरे अल्फाज़

प्रकृति का शोर

Awadhesh Kumar

13 कविताएं

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इन नदियों की सरसराहट हवाओं का शोर.
मुझे लुभाती यह प्रकृति का शोर.
पेड़ की शाखाओं पर परिंदों का हलचल.
झूमते मचलते हवाओं संग करते हलचल.
हवाओं ने छेड़ी उपवन में सुरताल.
मचलते मन ने दी धुनों की सुरताल.
मयूर का आवाज कोयल की गूंज.
जिंदगी की लहरों पर छड़ी अजब सी अनुगूंज.
लहरों पर किश्तियां यूं ही मचल रही.
किसी राहगीर की आहट में लहरे लहरा रही.
टिप टिप कर बरसती सावन की मचलती बारिश.
दिल से दिलों की करती तलाश मचलती बारिश.
हवाओं में अजब सा खुमार छाया है.
प्रकृति ने जीवन मैं जीवन का खूमार लाया है.
सुबह से शाम का अनोखा रंग लाया है.
प्रकृति जिंदगी का एक अनोखा बयार लाया है.
चलो मिलकर खुद की दूरियों को बांट लें.
आपस में गले मिलकर लम्हों को बांट लें.
मुश्किल से दिखती है अब इस शहर में बारिश.
पर्यावरण की हो रहे अत्यधिक दोहन ने बिगाड़ी बारिश.
चल मिलकर संवार ले अधूरी ख्वाहिश.
फिर मिले ना मिले यह मनमोहक प्रकृति की ख्वाहिश.

अवधेश कुमार राय.
धनबाद झारखंड

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