बेचारा आदमी

                
                                                             
                            एक साधारण आदमी के बारे में
                                                                     
                            

मैं हूं स्वतंत्र,
तो कुछ भी कह सकता हूं,
मैं हूं स्वतंत्र,
तो चुप भी रह सकता हूं,
सोच नहीं पाता हूं अक्सर,
कि क्या कर सकता हूं,
कैसे जी सकता हूँ मैं,
कैसे संवर सकता हूं,
बस इसी दोराहे पर आके,
बेबस सा हो जाता हूं,
होंठों को सी लेता हूं,
और फ़िर चुप हो जाता हूं,
मैं दीपक की भांति
जलता रहता हूं खुद ही खुद में,
चुपचाप आंसुओं में
पिघलता रहता हूं खुद ही खुद में,
कभी-कभी मेरा भी दिल दुखने लगता है,
मानो सपना ही आंखों में चुभने लगता है,
आंखें फैलाकर सपनों का हिन्दुस्तान ढूँढता हूँ,
एहसान तो मिलते हैं पर मैं सम्मान ढूँढता हूँ,
कई बार मानवता के हत्यारे भी मिल जाते हैं,
घिर जाता हूँ भीड़ में तब इंसान ढूँढता हूँ,
पर मैं भी मजबूर बहुत, कुछ करना तो चाहता हूँ,
पर बहते खूनी दरिया में गंगा जल सा घुल जाता हूँ ,
गुस्सा तो आता है,
कभी किसी के घाव देख कर,
धूप में जलते पाँव देख कर ,
पर सूरज चढ़ता देख जरा
रुक लेता हूं कहीं पे छांव देख कर
जब बच्चे रोने लगते हैं,
संग भूखे सोने लगते हैं,
तब भुखमरी से मैं भी फ़िक्रमंद हो जाता हूँ,
पर क्या करूं आदत है मुझको,
खाना खा कर सो जाता हूँ,
कोशिश तो हर क्षण करता हूँ,
कई बार तो प्रण करता हूँ,
कि पूरी जान लगा दूँगा
और हिन्दुस्तान बचा लूँगा
कुछ कर के ही जाऊँगा,
वरना मर के ही जाऊँगा,
और जब चल देता हूँ प्रण-पथ पर
फिर रुक जाता हूँ एक झिझक पर
तब सोचता हूँ कि मैं अकेला हूँ !
मेरे परिवार मैं कोई और नहीं,
फिर सोचता हूँ कि मैं अकेला हूँ ?
क्या बेदार है कोई और नहीं,
मेरे अकेले से ये देश नहीं बदलेगा
न्यौछावर से भी मेरी हल नहीं निकलेगा ,
ये भी हो सकता है मुझमें ही खोट गिनाया जाये,
मेरी मृत्यु को मुद्दा फ़िर वोट बनाया जाये,
ये तो पक्का है कि सवाल तो होगा ,
मेरे मरने का भी इस्तेमाल तो होगा ,
नहीं समर्थवान हूँ तो,
ये दुआ सही करके जाऊँगा,
कुछ भला नहीं कर पाऊं तो
कुछ बुरा नहीं कर के जाऊंगा,
नहीं चाहता मेरा बदला किसी गैर के खून से हो,
जीवन भर बेचैन रहा मरना तो भले सुकून से हो !

-अवनीश त्रिपाठी 

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4 years ago

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