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मेरे अल्फाज़

उधर नज़रों को वो मेरी तरफ जब घुमाते हैं

Avinash Srivastava

1 कविता

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उधर नज़रों को वो मेरी तरफ जब घुमाते हैं
कसम से हम तो उन नज़रों में डूब जाते हैं
या ख़ुदा खैर करे, उलझन पर उलझन बढ़ती जाती है
ना नज़रे वो चुराते हैं नज़रे हम छुकाते हैं

उधर मासूमियत से सबपे अपना हक़ जताते हैं
इधर हम उनके ख़्वाबों पे अपना हक़ जताते हैं
इलाही खैर हो, उलझन पर उलझन बढ़ती जाती है
ना वो अपना हक़ जताते हैं ना हम अपना हक़ हटाते हैं


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