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मेरे अल्फाज़

नवगीत

Avinash Beohar

173 कविताएं

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अंधियारी रातें
हैं करती
रहीं रुदाली।

चांद तारे
बहुत ही
गमगीन दिखे।
बात करें
भारत की तो
चीन दिखे।।

छिछोरी हरकत
जेठ मास की
लगे कुचाली।

मधुऋतु को
जाने है
सदमा किसका।
सियाचिन का
हिमनद-
धीरे से खिसका।।

जैसे किसी
झोपड़ी में
घुस जाए रुजाली।

घास के
मैदान उतरे
खेतों में।
कल्पतरु शमी
मुस्काया-
रेतों में।।

बरो को
जड़ से उखाड़ने
अब चली कुदाली।

अविनाश ब्यौहार
जबलपुर

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