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मेरे अल्फाज़

स्वाभिमान

Ashwani Kumar

6 कविताएं

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ये उनके लिए जो भाव खाते हैं
हम तो ठहरे सीधे साधे
कहां हम ताव खाते हैं
पर बता दूं तुम्हें
तुम्हारे जैसे तो कई आते हैं
पर सोचो वो कहां दिल में बस पाते हैं
कुछ लगाव हुआ है तुमसे
वर्ना हम भी कहां इतना सह पाते हैं
पता है हैसियत तुम्हारी कुछ ज्यादा है हमसे
मगर फिर भी लोगों के आगे कहां हम झुक पाते हैं
घमण्डी नहीं, स्वाभिमानी हैं तभी तो
सर उठा कर कहीं भी निकल पाते हैं।

पं अश्वनी कुमार मिश्रा

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