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मेरे अल्फाज़

मिलन

Ashok Srivastava

22 कविताएं

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आंखें तड़पती थीं सदा, दीदारे इश्क को
आया हसीन मंजर, तो फिर होश ना रहा

मिलन की हंसी घड़ी में, आंखें झुकी रहीं
दीदार उनके हुस्न का, धड़कनों ने कर लिया

दिलकश हसीं लम्हें, जुबां कुछ न कह सकी
सांसों ने हाले दिल, खुलकर बयां किया

गुमान बहुत था, बेमिसाल हुस्न रंग का
इश्क़ से मिलन के बाद, हम जर्रा हो गये

सदियों की तड़प मिट गई, पर आग ना बुझी
पहले तो बस तड़प थी, अब शोले शवाब पर

- अशोक श्रीवास्तव
राजरूपपुर, इलाहाबाद

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