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मेरे अल्फाज़

सच सुनने में डर लगता है

Ashok Srivastava

38 कविताएं

291 Views
सच सुनने में डर लगता है
सच कहने में डर लगता है
अंधों की इस नगरी में अब
आंखों को भी डर लगता है

अंधों को दृश्य दिखाई दे
वो आंख कहां से मैं लाऊं
गूंगों की आह सुनाई दे
वो कान कहां से मैं लाऊं

दिल में तूफान उठा दे जो
वो जज़्बात कहां से मैं लाऊं
कायर का खून उबाले जो
वो गीत कहां से मैं लाऊं

सोच ना तू अब दुनिया में
क्या पास है तेरे खोने को
उठ जाग मुसाफिर भोर भई
अब वक्त कहां है सोने को

ना कहने सुनने में समय गवां
इक नई क्रान्ति का बिगुल बजा
इक नया समाज बनाने को
दो हाथ उठा, दो कदम बढ़ा

- अशोक श्रीवास्तव
  राजरूपपुर, इलाहाबाद

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