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मेरे अल्फाज़

चलो आज फिर...

Ashok Srivastava

36 कविताएं

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बदली बदली फिजायें, बदला समां
ज़मीं भी नयी, आसमां भी नया
न बदला सपनों में, तेरा रोज आना
तन्हाइयों में बेबस, करवट बदलना
तन्हाइयां अपनी, आबाद कर लें
चलो आज फिर, सपनों को जी लें

न भूला तेरा, बेबसी छिपाना
नज़रें मिला के, नज़रें झुकाना
दुपट्टे से अपना, हसीं चेहरा छुपाना
चूड़ियां खनकाके, मुझको बुलाना
गुजरे वो लम्हे, महसूस कर लें
चलो आज फिर, सपनों को जी लें

न भूली वो यादें, कसमें वो वादें
वो अधूरा मिलन, वो अधूरी बातें
निभाई गयी वो, दिलकश रस्में
खायी थी संग, जीने मरने की कसमें
अधूरी वो कसमें, हम पूरी कर लें
चलो आज फिर, सपनों को जी लें

मिले थे जहां, उन जगहों को ढ़ूढ़े
हसीं शाम की, बेबस लम्हों को ढ़ूढ़े
जवां रात की, मस्त कशमकश को ढ़ूढ़े
खोये हसीं दिलकश, सपनों को ढ़ूढ़े
हसरतों में डूबी, हसीं रातों को जी लें
चलो आज फिर, सपनों को जी लें

-अशोक श्रीवास्तव
 राजरुपपुर, इलाहाबाद

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