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मेरे अल्फाज़

फिर मैं घर से बापू क्यों निकाली जाऊँ

Ashok Singh

88 कविताएं

21 Views
फिर मैं घर से बापू क्यों निकाली जाऊँ
ओ मेरे बाबुल प्यारे
तू तो लाड़ली को पुकारे
तेरी आवाज़ सुन मैं जी लूँ
उछल आसमान को छू लूँ
तेरे आदेशों पर मैं तो वारी जाऊँ
फिर मैं घर से बापू क्यों निकाली जाऊँ?

तू तो है मेरा गुरुर
तेरे से है मेरा वजूद
तुझसे ही मैंने जीना सीखा
सपनों को भी सँजोना सीखा
तुमसे ही है मेरा स्वाभिमान
तुम्ही ने दिखाया मुझे ये जहांन
तेरे आदेशों पर मैं तो वारी जाऊँ
फिर मैं घर से बापू क्यों निकाली जाऊँ?
मैं तो तेरे ज़िगर का टुकड़ा
तेरा रक्त रग रग में दौड़ा
खून पसीने से सींचकर पाला
अपने मुँह का खिलाया निवाला
मुझको स्वावलंबी बनाया
ख़ता क्या हुई मुझसे बापू
कि सयानी होते ही कर दिया पराया
तेरे आदेशों पर मैं तो वारी जाऊँ
फिर मैं घर से बापू क्यों निकाली जाऊँ?

मैं तो तेरे घर की हूँ रौनक
तेरे हर सवाल की थी जवाब
घर के कामों में हाथ बंटाती
तेरे आदेशों पर मैं तो वारी जाऊँ
फिर मुझको क्यों समझा पराया?
कन्यादान का क्यों रस्म निभाया?
अपने ज़िगर के टुकड़े को
बापू तुमनें क्यों किया पराया?
मुझे सर्दी बुखार होने पर
जिन आँखों से झरना बहती थी
मन बेचैन हो उठता था
भूख प्यास मिट जाती थी
उन हाथों ने आज़ कैसे
कन्यादान का रस्म निभाया?
तेरे आदेशों पर मैं तो वारी जाऊँ
फिर मैं घर से बापू क्यों निकाली जाऊँ?

कातर स्वर में बोली बेटी -
क्या तुमने सच में मुझको छोड़ दिया?
इस स्वर ने बापू के मन को
अंदर तक झकझोर दिया

मन मसोसकर बापू बोला -
तू तो मेरे ज़िगर का टुकड़ा
किसने कहा पराई है
सामाजिक रस्मों को निभाना
मेरी तो लाचारी है
तेरी शादी करके घर को बसाना
मेरी जिम्मेदारी है
तेरी माँ को दिए वचन को निभाना
मेरी तो मज़बूरी है
बुक्का फाड़कर बापू रोया
तू तो मेरे ज़िगर का टुकड़ा
किसने कहा पराई है
तू तो मेरे फुलवारी की
जूही बेला और चमेली है
खिलते ही माली से, तेरा नाता टूट गया
गठबंधन परमेश्वर से, अब तो तेरा हो गया
कन्यादान करते ही बेटी,तेरा घर बदल गया
पंचतत्व साक्षी बना, मधुकर को सौंप दिया
रंगरूप और सौरभ से,उस घर को भर देना
बापू का स्वाभिमान,वहाँ भी जीवित रखना

कहे अशोका सुन रे गुड़िया
बापू को भुला मत देना.....
'तू तो मेरे ज़िगर का टुकड़ा
बस इतना वचन निभा देना
जीवन के अंतिम बेला में
बस गंगाजल पिला देना।'

----अशोक
मुंबई
9867889171


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