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मेरे अल्फाज़

अधूरी आकांक्षा

ashok kumar

77 कविताएं

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थे हम बहुत दिनों से इंतज़ार में,अब जाके नज़र तुम आये हो
जरा खोलो अपनी प्रेम पोटली,देखें तो बचाकर क्या लाये हो

जब तुम न थे,सारे ये आकाश खुले,न जाने क्यूं सहम गए थे
सुर्ख आंखों के डोरे,गालों की रौनक,सौंप किसे तुम आये हो

जब विदा हुई थी,आंखों से मेरी,तेरा सब कुछ सुंदर सुंदर था
देहयष्टि सरिता जैसी थी,और गहरी आंखों में प्रेम समँदर था

आज मिले हो पतझड़ के वृक्ष से ,मात्र शून्यता आभास लिए
तुम हरीतिमा,कलियों की लड़ियाँ,सौगात किसे कर आये हो

खोल चुके तेरे दिल की झोली,आंसू,सिसकी हैं कुछ भी नहीं
वो मुस्कानें,अपना अल्हड़पन ,तुम किस पे लुटाकर आये हो

है ये दुनिया निष्ठुर क्रूर बहुत,सब कुछ नोच नोच खा जाती है
तुम शायद खुशकिस्मत हो ,जो स्वयं को बचाकर ले आये हो

यूँ इन सांसो की सरगम का झगड़ा है ,जाना तो है एक जगह
जाने पे अफसोस किया था,अब आने पर शायद पछताए हो


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