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मेरे अल्फाज़

क़िस्सा : बारिश

ashish tyagi

1 कविता

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बादल उफ़क तक बिखरे हैं आसमान में..
मानो किसी मुसन्निफ ने, वहशत में, मेज़ पर रखे अफसाने के पन्नों को फर्श पर फैला दिया है।
और उन सफ़हों से हर्फ़ दर हर्फ़ सियाही पिघल कर फर्श पर टपक रही है..
सफ़हों पर उकेरे हुए लफ़्ज़ों में एक नाम भी शामिल है
जो ख़ुद में ही एक उम्र, एक ज़माना और कई क़िस्से समेटे हुए है।
वो नाम भी अब पिघलने लगा है..
बादलों से टपकते उन लफ़्ज़ों से फज़ा संजीदा होने लगी है।
बियाबान सब सुन्न पड़ गए हैं।
मगर कहीं तो ये बूंदें आख़िर राहत की वजह भी हुईं होंगी..
किसी सहन में तो वो नाम भी टपका होगा।
मैं देख रहा हूं आसमान में..

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