मर्यादित बनो तुम राम सा

                
                                                             
                            नर मर्यादित बनो तुम राम सा,
                                                                     
                            
त्यागी बनो विशाल साl
सरलता का प्रवास जहां,
राम का निवास वहांll
नर मर्यादित बनो तुम राम सा...
भूतल पर जहाँ राम हैं,
कण-कण वहाँ बलवान हैंl
जहाँ शत्रु को भी स्थान हैं,
वह निर्मल हृदय राम हैंll
नर मर्यादित बनो तुम राम सा...
मात्रीवाणी का जहां सम्मान हो,
राजभोग छोड़कर आज्ञा प्रधान होl
बनवास जहाँ मान हैं,
एेसा प्रभू -प्रये राम हैंll
नर मर्यादित बनो तुम राम सा...
जो भक्त है रमेश्वर की,
जहाँ ईश्वर का गुणगान हैl
एक बाण संधान से ही,
दुष्ट का विनाश हैll
नर मर्यादित बनो तुम राम सा...


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
1 year ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
X