आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Prem nivedan

मेरे अल्फाज़

प्रेम निवेदन

Ashish Mishra

3 कविताएं

54 Views
दरिया तुम्ही हो तुम्ही हो समंदर
डूब गया मैं उतरा जो अंदर
फ़िज़ाओं में ख़ुशबू छाने लगी है
यहां जो कदम तुम्हारे पड़े हैं
चमकने लगी है अमावस की रातें
अगूंठी में तेरी हां हीरे जड़े है
बुला लो मुझे तुम अपने ही दर पर
तू मेरा खुदा मैं तेरा कलंदर
हम तो खड़े है अक्षत लिए
साथ रहने का तुम दे दो वचन
जब भी लड़ेगीं हमारी राशियां
जोतिष बुला के कर लेंगे हवन
प्यासे खड़े है तेरे दर पर आके
ऐसे बढ़ाओ न तुम मेरा बसंदर
बहुत ही सरल है हां मेरी गणित
इस तरह तुम ना मुझको घटाओ
बहुत सुना है तुम्हारे विषय मे
न्यूटन का तृतीय नियम तुम लगाओ
जब भी जुड़ेगें खुली गांठ अपनी
दुनिया भी बोलेगी है कितने सुंदर
योगी हुआ मैं तेरे प्यार में
तुम को जोगन मेरा फिर होना पड़ेगा
लिख रहा हूं तेरे गीत मैं
फिर मेरे साथ तुम को ये गाना पड़ेगा
पूरी जो करनी है अपनी तपस्या
पहाड़ों ढूंढे अपना ही कन्दर


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!