प्रेम निवेदन

                
                                                             
                            दरिया तुम्ही हो तुम्ही हो समंदर
                                                                     
                            
डूब गया मैं उतरा जो अंदर
फ़िज़ाओं में ख़ुशबू छाने लगी है
यहां जो कदम तुम्हारे पड़े हैं
चमकने लगी है अमावस की रातें
अगूंठी में तेरी हां हीरे जड़े है
बुला लो मुझे तुम अपने ही दर पर
तू मेरा खुदा मैं तेरा कलंदर
हम तो खड़े है अक्षत लिए
साथ रहने का तुम दे दो वचन
जब भी लड़ेगीं हमारी राशियां
जोतिष बुला के कर लेंगे हवन
प्यासे खड़े है तेरे दर पर आके
ऐसे बढ़ाओ न तुम मेरा बसंदर
बहुत ही सरल है हां मेरी गणित
इस तरह तुम ना मुझको घटाओ
बहुत सुना है तुम्हारे विषय मे
न्यूटन का तृतीय नियम तुम लगाओ
जब भी जुड़ेगें खुली गांठ अपनी
दुनिया भी बोलेगी है कितने सुंदर
योगी हुआ मैं तेरे प्यार में
तुम को जोगन मेरा फिर होना पड़ेगा
लिख रहा हूं तेरे गीत मैं
फिर मेरे साथ तुम को ये गाना पड़ेगा
पूरी जो करनी है अपनी तपस्या
पहाड़ों ढूंढे अपना ही कन्दर


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1 year ago

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