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मेरे अल्फाज़

वर्तमान और भूत

Ashish Kumar

28 कविताएं

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अतीत की यादों में खोये हुए
जब कभी पलटता हूँ वक्त के पन्ने
एक प्रश्न स्वतः ही बार बार
मस्तिष्क पर करता है प्रहार
हम आज के इस डिजिटल युग में
अधिक खुश हैं या तब थे
जब इतने सुख साधन ना हुआ करते थे
निश्चित ही अब
गर्मी में थके हारे बाहर से आओ
एक बटन दबाओ ठंडी हवा खाओ
बोर होने का तो सवाल ही पैदा नहीं
समाचार गाने खेल देखो मोबाइल पर हर कहीं
टेक्नोलॉजी का युवाओं को बड़ा फायदा हुआ है
व्हाट्सप्प और फेसबुक पर कितनों का प्यार जवां हुआ है
इमोजी से प्यार का इज़हार कर लो
वीडियो कॉल से लाइव दीदार कर लो
और एक हमारा समय था कि
एक प्रेम पत्र देने के लिए कितने जुगाड़ लगाने पड़ते थे
महीना महीना भर उसकी गलियों के चक्कर लगाने पड़ते थे
छोटे छोटे बच्चों को डाकिया बनाना पड़ता था
हर बार कुछ ना कुछ दिलवाना पड़ता था
और अगर इतने पर भी उनको खुश ना कर पाते थे
तो नालायक बच्चे उसकी माँ को खत दे आते थे
रिश्तों में दिखावा नहीं प्यार हुआ करता था
हर सुख दुःख में एकत्र सब परिवार हुआ करता था
आज कल तो फेसबुक पर स्टेटस अपडेट हो जाते हैं
मृत्यु के शोक सन्देश पर भी लाइक आते हैं
एक घर में रहकर भी अलग होते जा रहे हैं
इंसान को भूल मशीनों में खोते जा रहे हैं
धीरे धीरे हम भी मशीन होते जा रहे हैं
धीरे धीरे हम भी मशीन होते जा रहे हैं

- आशीष

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