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मुझसे मिलता नहीं

                
                                                                                 
                            ये कैसा बाग जिसमें कोई फूल खिल नहीं रहा
                                                                                                

वो मेरे शहर में है और मुझसे मिल नहीं रहा
उसका चेहरा चांद, जुल्फें दरिया बातों में खुशबू आज भी होगी
पर शायद अब उसका दिल, दिल नहीं रहा
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करे
9 months ago

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