मजबूरी

                
                                                             
                            अंगारों सी तपती ज़मीन पर
                                                                     
                            
पाँव पटकते हुए
गाल पर सूखीधार के आँसू
गरीबी और भुखमरी से
लड़ते हुए
वो आया छनकते पाँव
के साथ
मर्द के ढांचे में हो
घुंघरूओं के साथ
वो आया अपना
हुनर दिखाने
खुद के बच्चों को छोड़ भूखा
औरों को हंसाने
उसकी रोई आँखें देख
कोई परेशान न हुआ
क्यूँ नाचा अंगारों सी ज़मीन पर
कोई हैरान न हुआ
खुद की नुमाइश करना
आसान न था
उस मजमे में शायद
कोई इंसान न था।।

- आशिका तिवारी
हरदोई स्वरचित


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8 months ago
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