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मेरे अल्फाज़

शायद यह महारास है

Asha Sahay

11 कविताएं

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आकाश ने भेजी हैं तप्त तरंगे
विद्युत सी चपल ताप धर
कदम ताल में बंधे हुए
ताप के झंकृत लयों ने
ले लिया आगोश में अब
चर -अचर, नभ औ धरा को
सोने सी चमकती धूप भी
भर गयी उनकीचटक से
चटक
सोख लेती जीवनतरलता
तीव्रगति
करती फिर नग्न नृत्यभीधरा के वक्षस्थल पर
देकदम ताल
फैलती लहक लहर बन
लील लेतीं सुकुमार जीवन
शेष कुछ नहीं अब
ताप ही ताप बस
भयावह।

पके हुए स्वर्ण की तीक्ष्ण प्रभा ने
भर दी है चकाचौंध नयन मे
छीन ली है चैन साँसों की
मुँद जाती हैंआँखें रह रह
चमत्कृत
झपकती हैं पलकें पल पल
और,
तप्त गात में चुभ रहे हैं
अग्नि शिखा के तीव्र नर्तन
धरा धूल कण भी सेते
नर्तन के बिखरे अग्णिकण
रक्तबीज सा बिखरा जो
बहु स्फुलिंग स्वरूप धर तन
छिटक रहीं चिनगियाँ
तीक्षण ताम्र कतरनों की ज्यों।

स्तब्ध प्रकृति
ठहर गया ज्यों काल भी
गति मद्धिम।
झुलस रहा जग जीवन
कैसा यह उपहास है
शायद यह
महारास है
धरती संग नभ का
फूटते हैं नव अंकुर अब
शुष्क तन में हरीतिमा के
अमल तास के पीत पुहुपों ने
रँग दिया चरम विलास है।
शायद यह महा रास है।

- आशा सहाय –16—5—2017।

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