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मेरे अल्फाज़

मकरसंक्रांति पर्व- संग मनाने का गर्व....

Arvind Sharma

221 कविताएं

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मकरसंक्रांति का आता पर्व
संग मनाने में होता है गर्व।

पवित्र नदी हो गंगा
अमीर हो या गरीब
जातिगत का न होता भेदभाव
सब स्नान करते हैं संग-संग।
चेहरे हैं खिले,दिख रहे हैं प्रसन्न।
मकर संक्रांति पर स्नान का संग
कर रहे हैं गर्व,मना रहे हैं पर्व।

बच्चों को रहता है इंतज़ार
चेहरे पर मुस्कान छाये
जब पतंग ऊंची लहराये।

पतंग के होते अनेक रंग
लाते लाल-पीला,सफ़ेद,कोई रंग
छोटा हो या बड़ा
नहीं करते एक-दूसरे को तंग
पतंग उड़ाते हैं संग-संग।
कटी पतंग को लूटने जाते
'लूटेरे' नहीं है कहलाते।
मकरसंक्रांति का पर्व,होता है गर्व।

मकरसंक्रांति का है प्रसंग
खिचड़ी भी खाओ संग
तिल व गुड़ का हो संग
मिठास का लड्डू होता है संग।
न करो किसी को तंग
मकरसंक्रांति का पर्व,साथ खाने का गर्व।

अरविन्द कुमार शर्मा 'कवि'
जी0जी0रेसिडेंसी
पश्चिमपुरी चौराहा
आगरा ।


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