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God of fields

मेरे अल्फाज़

खेतों के भगवान

Arvind Dubey

39 कविताएं

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फुरसत अगर तुम्हें मिल जाये,
मंदिर के भगवान से।

तो थोड़ा सा तुम मिल लेना,
खेतों के भगवान से।

ग्राम देवता की संज्ञा,
है ब्यर्थ नहीं दी जाती उनको।

झर-झर बहे पसीना तन से,
एहसास नहीं गर्मी का जिनको।

हर मौसम में मेहनत वे,
करते हैं जी जान से।

फुरसत अगर तुम्हें मिल जाये,
मंदिर के भगवान से।

मंदिर के अंदर तो बैठी,
बस पत्थर की मूरत है।

पर खेतों में जाकर देखो,
इक हाड़-मांस की सूरत है।

कुशल छेम पूछा है क्या,
जाकर किसी किसान से।

फुरसत अगर तुम्हें मिल जाये,
मंदिर के भगवान से।

दिन-रात परिश्रम करने का,
क्या फल उनको मिल पाता है।

फसल अगर बर्बाद हो गई,
तो वह किसान मर जाता है।

उफ तक नहीं निकलती है,
धनिकों की कभी जुबान से।

फुरसत अगर तुम्हें मिल जाये,
मंदिर के भगवान से।

हम महलों में बैठ उन्हीं के,
कर्मों से ही जिंदा हैं।

दिया उन्हें क्या बस खाया,
सोच यही शर्मिंदा हैं।

हल की कीमत जाओ पूछो,
उस गरीब इंसान से।

फुरसत अगर तुम्हें मिल जाये,
मंदिर के भगवान से।

मंदिर के भगवान तुम्हारे,
भोग-प्रसाद नहीं लेते।

और चढ़ावा ढेरों तुम,
जाकर उनको दे देते।

जाकर किसी अन्नदाता को,
कुछ दिया कभी सम्मान से।

फुरसत अगर तुम्हें मिल जाये,
मंदिर के भगवान से।

तो थोड़ा सा तुम मिल लेना,
खेतों के भगवान से।

- कवि अरविन्द दुबे(मनमौजी)

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