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मेरे अल्फाज़

गर्भ से बोली है बिटिया

Arvind Dubey

102 कविताएं

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गर्भ से बोली है बिटिया,माँ के अपने कान में
माँ मुझे इतना बता,क्या कष्ट तेरे प्राण में

माता सिसकते बोलती है,राज सारे खोलती है
कान में गर्भस्थ शिशु के,दर्द सारा घोलती है

हैवानियत के गुण सभी,अब आ गए इंसान में
गर्भ से बोली है बिटिया,माँ के अपने कान में

पीठ के घावों को अपने,वस्त्र से ढकती है माता
और कहती हो गया,हत्यार से मेरा है नाता

भूल पापा से हुई,पापी मिला अनजान में
गर्भ से बोली है बिटिया,माँ के अपने कान में

ध्यान से सुनती है बेटी,माँ की अपने बात को
सो नहीं पाई थी माता,कष्ट में कल रात को

पी के मदिरा घुस गया था,भूत उस शैतान में
गर्भ से बोली है बिटिया,माँ के अपने कान में

बाप तेरा गर्भ में ही,प्राण तेरे चाहता है
बाद में जिंदा जले तूँ,मुक्ति इससे चाहता है

धनपशू हैं चाहते धन,खूब कन्यादान में
गर्भ से बोली है बिटिया,माँ के अपने कान में

रास्तों में बेटियों की,आबरू पर घोर संकट
घूमते लुच्चे,लफंगे,मनचले,मदहोश,लंपट

मारते हैं सीटियाँ अब,शोहदे सम्मान में
गर्भ से बोली है बिटिया,माँ के अपने कान में

बेटियों के नाम से,नफरत है उनको हो गई
सृष्टि को जो जन्म देती,गौण ही वह हो गई

पुत्र की चाहत में लाखों,सब बहाते दान में
गर्भ से बोली है बिटिया,माँ के अपने कान में

माँ की बातें सुन के बेटी,का हृदय तब रो दिया
बीज नफरत का मनुज ने,आज कैसा बो दिया

फर्क सब करने लगे अब,कोख की संतान में
गर्भ से बोली है बिटिया,माँ के अपने कान मे

जन्म दूँगी मैं तुझे सह,हर ब्यथा बेटी सुनो
मत करो चिंता जरा,मत कष्ट के ताने बुनो

नालायक बेटों की कमी,है नहीं खानदान में
गर्भ से बोली है बिटिया,माँ के अपने कान में

माँ मुझे इतना बता,क्या कष्ट तेरे प्राण में

कवि अरविन्द दुबे

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