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मेरे अल्फाज़

स्पंदन

Arun prasad Shukla

16 कविताएं

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स्पन्दन


संतप्त आज संतापों से मन विचलित बोल उठा आली!
जब अपने ही आज पराए हों फिर कैसी होली? दीवाली?

घर का कंता परदेस बिराजे बेटे पढ़ते हो लंदन में।
बच्चे-गरीब फुटपाथों पर दिन बिता रहे हो क्रन्दन में।

श्रमिक आज खुद के श्रम का भी उचित मोल ना पाते हो।
हित -हेतु- पूर्ति संबंध सगे भी पैरों से कुचले जाते हों।

भाई, 'भाई के आंखों का कांटा;' बहना भी राखी भूल गई।
घर मे झगड़े अरु फूट देख दुश्मन की छाती फूल गई।

फैली अशांति चहुं ओर आज रिश्तों में ममता दिखती जाली।
जब अपने ही आज पराए हो फिर कैसी होली? दीवाली?

धर्मो में फैली राजनीति त्योहार बोट के बैंक हुए।
जो कल तक थे राम-राम रटते क्षण में आज रहीम हुए।

भंडारों में सड़ता अनाज जनता भूखी चिल्लाती है
निर्दयी क्रूर बेदर्दों को फिर भी शर्म ना आती है।

युवा देश के पढ़-पढ़ कर सड़कों पर लाठी खाते हैं।
मजबूर कृषक भी फंदों में लटके पाए जाते हैं।

आज अरुण फिर व्यथित हुआ छिपने को मेघ नसीब नहीं।
शुक्ल-गगन रवि से पूछे फिर भी कोई तरकीब नहीं।

भारती मातु! सदुपाय करो सब में भर दो तुम खुशहाली।
भाईचारा घर घर में हो, घर घर में होली - दीवाली।

संतप्त आज संतापों से मन विचलित बोल उठा आली!
जब अपने ही आज पराए हों फिर कैसी होली दिवाली?

अरुण शुक्ला (अर्जुन)
एम ए /एल एल बी/ बी एड प्रयागराज






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