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मेरे अल्फाज़

नारी श्रृंगार से अंगार तक

Arun prasad Shukla

82 कविताएं

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नारी- श्रृंगार से अंगार तक


माथे की बिंदिया देखूं, या फिर अवलोकित गात करूं।
मैं चकाचौंध हूंँ हूर बदन का नूर देख क्या बात करूं।

श्रवणों के झुमके हमें बताते, राज बहुत ही गहरे हैं।
मत देख मधुप! जूड़ों के गजरे,उस पर भी अब पहरे हैं।

कंगन हाथों के खनक रहे हैं, भ्रमर गुंज सम कानों में,
चमक रही रह रह कर दामिनी, मुक्ताहार के दानों में।

हुआ तिरोहित दूर गगन रवि, अवलोकन कर बदन कान्तिमय।
उद्विग्न अचानक हुआ सरोवर रहता था जो पूर्ण शांतिमय।

अप्रतिम सुंदर मूर्ति देखकर, दर्पण भी शरमाता है।
पर तेरी सुंदर सच्चाई भी, अक्सर वही बताता है।

भूषण श्रृंगार परिधान अलौकिक कर धारण जब इठलाई।
इन्द्र लोक में खड़ी मेनका देख तुझे खुद शरमाई।

वसन रक्त अतिरंजित करता, शुभ्र-सुनहरी काया को।
तुम ही प्रकृति, मां भी तुम ही, नमन तुम्हारी माया को।


पुरुष भोग तेरा ही यौवन, सुख अधिकाधिक पाता है।
बेशर्म मगर निज सत्ता का ही हनक तुझे दिखलाता है।

हैं नारी तेरे रूप हजारों, बहन बहू मां होती तुम।
दुष्टों का बन संहारक, दुर्गावतार भी लेती तुम।

भोग का साधन मात्र न नारी, अपितु सृष्टि का कारण है।
इस अमिट सृष्टि के हर दु:ख का, बस नारी एक निवारण है।

अरुण शुक्ल अर्जुन
रत्यौरा करपिया प्रयागराज


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