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मेरे अल्फाज़

लाल बत्तियां...

Arjun Nirala

5 कविताएं

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गर न होतीं शहरों में ये लाला बत्तियाँ,
भूखे ही मर जाते हज़ारों बच्चे-बच्चियाँ।

कुछ दे जाते हैं, अठन्नी एक रुपया,
कुछ को ताकते ही रह जाते हैं बच्चे-बच्चियाँ।

कुछ बुलाते हैं, तो कुछ बंद कर देते हैं खिड़कियाँ,
उनको क्या पता कि कैसे जी हैं ये बच्चे-बच्चियाँ।

तपती धूप में, नंगे पाँव, ये कोमल सी कलियाँ
दिन-भर इधर से उधर भागते हैं बच्चे-बच्चियाँ।

सुना है सरकार ने चला रखी है इनके लिए कई योजना
भूखे पेट योजना को क्या जाने ये बच्चे-बच्चियाँ।

लाल बत्ती के पास, उग आया शहतूत ही है ठिकाना
घर क्या होता है, क्या जाने ये बच्चे-बच्चियाँ।

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