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मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल

Arif Sageer

2 कविताएं

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दिल में जबसे तेरी जुस्तुजू न रही
कुचें में तेरे बज़्म-ए-रौनक न रही,

बज़्म-ए-आम आज भी काफी है तेरे शहर में
मगर अब वो दोस्त बनाने की आदत न रही,

अदावत सी हो गयी है मुझको बनात से
एक अदा पे वो जान से जाने की आदत न रही,

अना कर चुकी है घर जबसे तुझमे
अब हकीक़त में तुमसे शिकायत न रही,

तेरे कदम - कदम पर बिखर जाता था सुर्ख गुलाब की तरह
अब चमन में भी वो राहत -ए- खुशनवार न रही ||

कुचें = गलियां 
बज़्म-ए-आम = लोग 
अदावत = दुश्मनी 
अना = अकड़

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