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मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल सहर आने तो दो

Apratul Chandra

3 कविताएं

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सहर आने तो दो


छंटेगा कुँहासा नई सहर आने तो दो l
बढ़ेगा कारवाँ सही डगर आने तो दो ll

यहाँ अँधेरा है बहुत, झरोखे खोल दो
धूप मुट्ठी भर ज़रा अंदर आने तो दो ll

बुरा वक़्त गीली रेत पे खिंची लकीर
बदलेगा अभी, एक लहर आने तो दो ll

सुबह से तो अमन है बदनाम शहर में
क़त्ल होगा यहां, दोपहर आने तो दो ll

थक गया हूँ बहुत ज़िन्दगी की दौड़ से
सुकून का अब एक पहर आने तो दो ll

आँखों से पीकर दिल में बसा लेंगे उसे
निगाहों में दिलकश मंजर आने तो दो ll

बेहद नाजुक हाल मेरा पर आए न वो
कहते रहे मौत की खबर आने तो दो ll

मौत से लड़ते रहे हम कहा रुक अभी
पहले उनकी सूरत नज़र आने तो दो ll

तुम पे भी कभी ग़ज़ल लिखेंगे अप्रतुल
तसव्वुर में खूबसूरत बहर आने तो दो ll


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