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मेरे अल्फाज़

रूह ज़ख़्मी रही

Apratul Chandra

4 कविताएं

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दो धड़ों के बीच फिर गरमा गरमी रही l
ये बस्ती रात भर सोई नहीं सहमी रही ll

खुदा का वास्ता दे हैवानियत करते रहे
दीन के बारे में कैसी ग़लतफहमी रही ll

मसलात रहे सियासतदारों के गुरूर के
बच्चो औ औरतों पे मगर बेरहमी रही ll

पलक झपकते ही बिछ गईं लाशें कई
बाद रस्मी हुक्मरानों की सरगरमी रही ll

तौलमोल जान और ज़ख़्म के सौदे हुए
मुआवज़ा बाँटते खुलेआम बेशरमी रही ll

दुआ-ए-अमन औ कौमी एकता के लिए
मोमबत्ती ले हाथ बस चहलकदमी रही ll

वक़्त ने घाव जिस्म के भर दिये अप्रतुल
लेकिन ये रूह मेरी, ता-उम्र ज़ख्मी रही ll


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