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मेरे अल्फाज़

ऐसी प्रीत हुई तुझसे

Aparna Mishra

12 कविताएं

389 Views
ऐसी प्रीत हुई तुमसे कि
मन मेरे उपवन बसता है
पोर पोर जो महके जूही
सांस सांस चंदन रचता है।

नैनों मेंं कुछ ऐसे बसे तुम
हर चेहरा तेरा लगता है
तुम संग जेठ का मौसम रुखा
मुझे आषाढ़ श्रावण लगता है।

तुमसे मन के तार जुड़े जो
ये जीवन सरगम लगता है
रग रग में बहती आसावरी
सांस ललित पंचम बसता है।

तेरी छुअन से निखरी मैं की
हर पत्थर कन्चन लगता है
हृदय बसे कुछ ऐसे तुम,
मेरा घर वृंदावन लगता है।।

तेरी प्रीत में बन गयी राधा,
तू मेरा मोहन लगता है
सही गलत,सुख दुख सब कुछ
ही मुझको मनभावन लगता है।।

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