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मेरे अल्फाज़

अपराधी कैसे नाबालिग है

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कैसे अपराधी नाबालिग है?
जबकि मानस व्यभिचारी है।
कुसूर है क्या उसका कि
जो मां की राजदुलारी है।

पौधा जैसे बढ़ता है,
उसका गुण दिखता है
अपराधी जैसे बढ़ता है,
उसका अपराध भी बढ़ता है।

छूट गया वह एक बार यदि
मनोबल उसका बढ़ जाएगा
सबकी आंख के सामने बेटी को
फिर से नंगी बनाएगा।

मिला न्याय उसे कहां,
जो जीवित न रही जहां में
मिला सम्मान उसे कहां,
जो लड़ मरी रक्षार्थ निज मान में।

रावण फिर से जन्म लिया है
सीता पर नजर गड़ाया है
धर्मराज की उदारता से
दुशासन मन बढ़ आया है।

चक्र थम गया बृजकिशोर
रथ का पहिया टूटा है
जिसने पंछी का है
नष्ट किया जीवन।
बख्श दिया जायेगा
कैसे उसका जीवन।

न्याय सहन कर सकेगा
कैसे अन्यायी को?
फिर से ला सकेगा कैसे
भाई मां की जायी को?

- बृजेश पाण्डेय ’बृजकिशोर’

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