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मेरे अल्फाज़

मेरी भी कलम को लिखना पड़ा

Anurag Shukla

1 कविता

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मेरी भी कलम को लिखना पड़ा है,
खुदा मुझे शक्ल-ए-इंसा में मिला है,
मैं जाकर बैठूं उसकी जुल्फों तले,
सुकूं का फकत यही एक रास्ता है,
जो भी है पास मेरे सब उसी का है,
उसी से ही सांसों का सिलसिला है,
खुद को कागज पे उतार दिया मैंने,
उसने हर्फ दर हर्फ मुझको पढ़ा है,
मैं अमूमन सभी से नहीं मिलता हूं,
एक उसके लिए दरवाजा खुला है।।

-अनुराग_शुक्ल


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