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मेरे अल्फाज़

देख रही हूँ आसमान में...

Anupama Sharma

1 कविता

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देख रही हूँ आसमान में-
गिनती की पहुंच से बाहर उन सितारों को
जैसे उनकी चमक से वो दुआ सलाम करते
दुनिया को भी कह रहे हों-
हमारा इलाका आसमान है
तुम ज़मीं पर कुछ बनकर चमको ..!
और उस चाँद को
जो तारों के बीच
कभी कभी तरबूज़ के कटे टुकड़े सा लगता है
पर आज पूरा है !
इनसे गुज़रते बादल को
जो तारों और चांद को कुछ धुंआ बनकर
एक ही जगह माला सा बनकर पिरो रहा है
बैजंती सा ..!
उस हवा को
जो अदृश्य तो है
पर शायद आसमान से इसका कुछ अक्स तो समझ आ जाए..!
और
उन भावनाओं को भी
जो इतनी मासूम है
शाम के आसमान के अंधेरे
होते ही दबे पांव चली आती है
जाती कहां तक है
इसका पता करने के लिए
आसमान को झांकती
हुई न ये मेरी उससे भी ज़्यादा नादान कोशिश...!

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