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Kavita Aur Mai

मेरे अल्फाज़

कविता और मैं

Anuj Shukla

2 कविताएं

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हे कवि !
इस बार मत प्रकाशित करना मुझे
मैं नहीं चाहती गैरों का आलिंगन
तुम्हारे द्वारा रचित मैं बस तुम्हारे
हृदय में जल रही वेदना की ज्वाला को शांत करना चाहती हूँ
मै रजस्वला स्त्री की तरह कई वर्षों से अछूती
और तुम ठहरे गहरे शांत मौन जल
तुम्हारी सुगबुगाहट से उत्पन्न तरंगें मेरे कौमार्य को आहत करती हैं

हे कवि !
इस बार मेरा वाचन मत करना
मैं संसार की प्रसिद्धि के लिए नहीं वरन तुम्हारे लिए जन्मी हूँ
मत सजाओ मुझे गैरों के कंठ में
इनकी वासनामयी दृष्टि, अधरों पर आदितृष्णा, श्वासों में दहकता काम
इनमे लिपटे आगरूपी भुजंग मेरा रंग काला कर देंगे
और याद रखना काले रंग पर फिर कोई रंग नहीं चढ़ता

हे कवि !
गाओ मुझे अपनी प्रेयषी के साथ
उसके पायल और कंगन के स्वरों से मेरा संगीत दो
सजाओ मुझे उसके रेशमी जूड़े में
बांधो उसके केशरिया आंचल के धागे में
मैं दोनों के प्रेम की साक्षी अपठित एक ग्रन्थ का श्लोक बनना चाहती हूं

हे कवि !
मुझे बस अपने तक सीमित रख
मुझे बस अपने तक सीमित रख

-अनुज शुक्ला 'गुड्डन'

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