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मेरे अल्फाज़

ये दौर नहीं अच्छा लगता

Anuj kumar

1 कविता

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अपने भी ऐसे हो जाये, बेगौर नहीं अच्छा लगता
बारिश का बेमौसम होना, घनघोर नहीं अच्छा लगता

जहा पहले से ही जलममग्न है धरती बेघर लोग जहां
बादल छा जाना बार बार, उस ओर नहीं अच्छा लगता

गर हो पाए मरने से पहले जिंदा मुझको दफ़न करो
इस मतलब वाली दुनिया का, अब शोर नहीं अच्छा लगता

वो कहते है, है वक़्त बुरा कल नया सवेरा आएगा
मन को मेरे ये आशाए, ये दौर नहीं अच्छा लगता

हर बार रुलाया जाता हुँ, हर बार कोई समझाता है
तुम लड़के हो जिनका पड़ना, कमज़ोर नहीं अच्छा लगता

बात सही है दुनियादारी दुनिया सिखलाती है पर
जब माँ यादों में आ जाये, कुछ और नहीं अच्छा लगता

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