आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   I am labour

मेरे अल्फाज़

मैं मज़दूर हूं

Anubhav Sagar

3 कविताएं

95 Views
हर सुबह निकल चला उनकी खुशियां सवारने मैं
हाथ सूज गए मेरे उनके घर को बनाने में
सूरज ढला फिर घर लौट आये जब हम
कटती जिन्दगी मेरी झोपड़ी में हरदम
रब से शिकवा नहीं, हालात से मजबूर हूं
दुर्भाग्य मेरा कि मैं मजदूर हूं।

उस कमाए पैसों से मैं छत भी ना तान सका
घिसे हाथों की लकीरों को भी ना पहचान सका
अपनी मेहनत से मैने दूसरों को खुश रखा है
दाल रोटी के सिवाय आज तक कोई पकवान ना चखा है
हा मैं आज अपनी खुशियों से दूर हूं
मैं एक अभिशापित मजदूर हूं।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!