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मेरे अल्फाज़

बैंकों का फर्जीवाड़ा

Ankur Singhai

11 कविताएं

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देश के लिए आज एक नया पैग़ाम लिखता हूँ
आज किसानों का दर्द सरेआम लिखता हूँ
तुम भूल न जाओ इसीलिए आयाम लिखता हूँ
हुए अत्याचार उन्हें आज खुलेआम लिखता हूँ

तरक्की पर तो पूरी दुनिया है औऱ खुले आंसमा पर है
लेकिन देश का किसान आज भी कर्ज में डूबा लहूलुहान है
आज़ादी मिले वर्षो हो गए फिर भी भूखा मरता किसान है
कर्ज़ में पूरा डूबा वो जिसका तुम्हारी नज़रो में न सम्मान है

आज एक नया नमूना देखा फ़ैला हुआ भ्रष्टाचार देखा
घोटालों की शक्लें देखी किसानों की छाती पर पकती रोटी देखी
हज़ारो किसानों पर चढ़ा है कर्ज़ जिन्होंने बैंको की शक्लें भी न देखी
आज ग़रीब किसानों की लटकी शक्लें देखी जब टँगी कर्जे की लिस्टें देखी


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