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Moh - Maya

मेरे अल्फाज़

मोह माया

Ankit Singh

3 कविताएं

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कभी-कभी मन करता है मेरा
छोड़ दूं सब मोह-माया

ना ही मेरी माया है
और ना ही मेरी काया

क्या लेकर आया था ?
क्या लेकर जाना है ?

जो यही पर कमाया था
वो यही पर रह जाना है

सफेद कपड़ों में लिपटेगा
लिपटेगा जिस्म मेरा

जिसमें मेरा तन भी होगा
जिसमे मेरा मन भी होगा

उठाकर धरा से रख देंगे
लकड़ी के लठों पर

ले-ले कर घी को छिड़केंगे
मेरे अंग वस्त्र पर

अग्नि जली हुई मशाल में
मुझे कोई मुखागनी दे जाएगा।

मुझमें से निकली हुई लपटों से
वो मुझसे दूर हो जाएगा

उसके बाद तो जिस्म मेरा
पंचतत्व में मिल जाएगा

ये समझ नहीं आया मेरे
वो घर जाकर क्या बतलाएगा

बच्चों से झूठ कहेगा
या बड़ो को समझाएगा

वो झूठ कहेगा बच्चों से
तारों में है उसका डेरा

बड़ो को वो इतना बतलाएगा
सदा दिल में रहेगा लाडला मेरा

घर से मेरी विदाई पर
फिर से सब रोएंगे

उतार कर पगड़ी को
वो नादां उसे भी भिगोएंगे

पास खड़ी आत्मा भी फूट-फूट कर रोएगी
विपत्ति की घड़ी में अपनी पलकें भिगोएगी

हफ्ते दस दिन बाद महीने
वो मुझको भूल जाएंगे

जब आएगा घर में कारज कोई
वो फिर से आंसू बहाएंगे

-अंकित सिंह

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