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मेरे अल्फाज़

प्रेम उपहार!

ankit bhagat

8 कविताएं

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ओस की बूंदे
चुनी मैंने
हरी मखमली दूब के साथ-साथ,
सावन की पहली फुहारों
और पूर्वी पवनों को मनाया,
उपवन से उधार ली मैंने
फूलों की महक,
जंगलों से पलाश और
उदग्र लहरें
प्रपाती सुर-सरिता से,

फिर शब्दों की लड़ी बनाकर
गूंथ लिए उनमें
सभी को करीने से,
अपराजिता की बेलें उलझाकर-
लटकाए
लाल-सिंदूरी-गुड़हल भी;

चंदा की अगवानी में
जड़े सितारे
मोतियों की मानिंद,
डुबोकर समंदर में-
सूरज को बीचों-बीच लगाया मैंने;
ताकि अर्पित कर सकूं
तुम्हें-
'सर्वोत्तम प्रेमोपहार'।

किंतु मुझे मालूम है
ये भेंट भी नहीं भाएंगे तुम्हें;
क्योंकि तुम्हारा-
सबसे प्रेमिल उपहार
मैं 'स्वयं' हूँ।


----अंकित।



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