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मेरे अल्फाज़

देख रे मानव

Anonymous User

5 कविताएं

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"सड़के सूनी, गलियाँ सूनी,
सूने हुए चौबारे;
देख रे मानव......
तूने कैसे काम किए करारे!

लोभ,हवस,होड़ में पड़कर,
तुमने सब कुछ बंटाधार किया;
कुछ लोगों की गलती ने...
सारी दुनिया को हैरान किया!

यूँ तो तुमने ज्ञान-विज्ञान में,
अपना परचम लहराया है;
धरती से आसमान तक,
एक नया मुकाम बनाया है!

तेरे नित नए-नए खोज ने,
सबका जीवन आसान किया;
लेकिन इस सबकी होड़ में,
तुमने प्रकृति को ही बर्बाद किया!

परमाणु अस्त्रों का भंडार बना,
तुमने खुद को चिता पर बैठाया है;
पूंजीवाद और साम्यवाद ने
पूरे विश्व को रणभूमि बनाया है!

शांति-समझौते और सम्मेलन,
अक्सर तुम तो करते हो;
पर अपनी स्वार्थपूर्ति हेतु,
सब दरकिनार भी रखते हो!

आज एक छुद्र से जीव ने,
तुमको इतना परेशान किया;
जिसके आतंक की वजह से,
तुमने खुद को घर में कैद किया!

विज्ञान के उन्नत दौर में भी,
आज इतनी विपदा आयी है;
संक्रमण और मौत की खबर,
हर रोज अखबारों में छायी है!

सोचो और बताओ....
तुमने क्या खोया, क्या पाया है?
विकास की अंधी दौड़ में,
तुमने जग को ज्वालामुखी बनाया है!

अब तो समझो और सुधरो...
तुम गलत दिशा में जा रहे!
प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर,
तुम खुद ही खुद को मिटा रहे!!"


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