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मेरे अल्फाज़

क्या कहकर संबोधित करोगी

Anita Maithani

40 कविताएं

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सुनो!
जब तुम कल
मेरा जिक्र करोगी
क्या कहकर
संबोधित करोगी!
ऐसा करते हुए
क्या तुम बिताए पलों को-
बांट नहीं दोगी,
मुझे स्वीकार्य नहीं
आज भी नहीं, कल भी नहीं।

मेरे चले जाने पर
तुम्हें टूटकर चाहने की
उस गति और पल में
तुमको लिखे मेरे
आसमानों से ऊँचे
सागर से गहरे
ख़तों को देखते हुए
क्या कहकर
याद करोगी,
प्रेमी कहोगी
या निरा आशि़क कहोगी।

किसी रोज
लौट आऊँ तो;
क्या ?
खुशी से नाच पड़ोगी,
लिपट कर मेरे कांधे भिगोओगी ...
खी-खी कर हँस दोगी ...
बताओ, जड़ हो जाओगी,
क्या कहकर
मुझसे मिलोगी
दोनों हाथ जोड़
नमस्ते कहोगी।

वो हँस दी
बोली-
पलकें झुकाकर दोस्त
शुक्राना करूंगी।

- अनीता मैठाणी

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