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मेरे अल्फाज़

मैं एक जंगल हूँ

Anil Kumar

1 कविता

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मैं एक जंगल हूँ

कहने को तो मैं एक जंगल हूँ
विकास की राह में अमंगल हूँ।
शहर-शहर को जोड़ती है जो सड़क
मेरी छाती पर साँप सी लोटती है बेधड़क।
हर गाँव का विस्तार हो रहा है
अब वहाँ शहर सा शोर हो रहा है।
गाँव तो बड़ा हो कर शहर बन गया
किन्तु मुझे देखो, मैं आज जंगल से सिमट कर क्या हो गया।
बड़े-बड़े जलाशयों ने मुझे डुबोया है
मेरे बहते आँसू कोई देख नहीं पाया है।
मैं जहाँ सीना ताने खड़ा था
इस धरा पर नगीने के जैसा गढ़ा था।
वहाँ अब आकाश छूती अट्टालिकाएं हैं
पशु-पक्षी बैचेन बेघर हैं, डरी सहमी सी हवाएं हैं
विकास की इस दौड़ मे सब अंधे हो रहे हैं
मैं एक जंगल हूँ, हाँ अब मेरे नामो-निशान खो रह हैं।

-डॉ अनिल कुमार लोहनी, रुड़की

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