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मेरे अल्फाज़

जायें किधर

Anil Kumar

307 कविताएं

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लेकर नहीं पैदा हुवे हैं गुलाबों का बिस्तर।
ग़र्द-ए-सफ़र किसी को आता नहीं नज़र।।

मंज़िल हमारी दिखती सबको हसीन सी।
पांवों के छालों से वो लेकिन हैं बे-ख़बर।।

कश्मकश है ज़िंदगी में क़ौन देखेगा इसे।
सब परीशां हैं यहां नजर जाती है जिधर।।

जानते जानते जब तलक वह जानेगा मुझे।
तब तलक ग़म-ए-दौरां ही जायेगा गुज़र।।

वही सिसकन वही आहें वही ग़म वही आंसू।
लेकर अनिल यह दिल बता दे जायें किधर।।

 पंडित अनिल
 अहमदनगर महाराष्ट्र


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