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मेरे अल्फाज़

मुक्त छंद

Anant Ram

5 कविताएं

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जिसके दीदार को आँखें हमारी तरसी हैं
याद कर जिसको शबे सहर में ये बरसी हैं
एक झलक उसकी दिखे बस इसी ख्वाहिश को लिए
भटकती फिर रही कैसी ये दर -बदर सी हैं

सबके चेहरे में उसका चेहरा नजर आता है
उसकी चाहत के सिवा और कुछ ना भाता है
जब भी तन्हाइयों में याद उसे करता हूँ
दिल मेरा उसको अपने आस -पास पाता है

तेरी नजरों की बेरुखी भी है कबूल मुझे
जरा भी गम ना करूँ तू जो जाये भूल मुझे
मैंने अपनी किताब में सम्भाल रक्खा है
जो तुमने प्यार से पहला दिया था फूल मुझे

एक मुद्दत के बाद उसका जो दीदार हुआ
प्यार से भी कहीं ज्यादा था उनसे प्यार हुआ
उसने कुछ ऐसी बेरुखी से निहारा मुझको
वर्षों का सपना जो दिल में था तार तार हुआ

जहाँ झरना झरे पर्वत के नीचे झील होती है
बिगड़ जाते हैं वे बच्चे की जिनपर ढील होती है
जो बोलो बात कोई भी हमेशा तौलकर बोलो
ना जाने कौन सी बातें किसी क्या फील होती हैं

अनन्तराम मिश्र

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