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मेरे अल्फाज़

वतन को नज़र लग गई

Anand Pravin

18 कविताएं

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नज़र लग गई किसी की शायद मेरे वतन को

सड़कों पर आ गयी है पूरी जनता देखो
नज़र लग गई किसी की शायद मेरे वतन को

एक- एक कर दफ़न हो रही हमारी एका
कैसे कह दे - देश बचा है गाँधी जी का

लहूलुहान है देश, उबल रही बहती धारा
निकला है शायद धर्म का रक्षक कोई बेचारा


लुप्त हो रही हमारी ख़ूबसूरती मानचित्र से
और खुश हो रहा है कोई तन - मन से

हमें रहना है धर्मनिरपेक्ष भारत देश में
हमें चाहिए हमारी सरकार गाँधी के भेष में।

आनंद प्रवीण, पटना।


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